श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.13.3

एकादश स्कन्ध · अध्याय 13 · अथ त्रयोदशोऽध्यायः

धर्मो रजस्तमो हन्यात् सत्त्ववृद्धिरनुत्तमः।

आशु नश्यति तन्मूलो ह्यधर्म उभये हते॥ ३

dharmo rajastamo hanyāt sattvavṛddhiranuttamaḥ|

āśu naśyati tanmūlo hyadharma ubhaye hate|| 3

अर्थ

जिस धर्मके पालनसे सत्त्वगुणकी वृद्धि हो, वही सबसे श्रेष्ठ है। वह धर्म रजोगुण और तमोगुणको नष्ट कर देता है। जब वे दोनों नष्ट हो जाते हैं, तब उन्हींके कारण होनेवाला अधर्म भी शीघ्र ही मिट जाता है॥ ३॥

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