श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.13.31

एकादश स्कन्ध · अध्याय 13 · अथ त्रयोदशोऽध्यायः

असत्त्वादात्मनोऽन्येषां भावानां तत्कृता भिदा।

गतयो हेतवश्‍चास्य मृषा स्वप्नदृशो यथा॥ ३१

asattvādātmano'nyeṣāṃ bhāvānāṃ tatkṛtā bhidā|

gatayo hetavaścāsya mṛṣā svapnadṛśo yathā|| 31

अर्थ

आत्मासे अन्य देह आदि प्रतीयमान नाम-रूपात्मक प्रपंचका कुछ भी अस्तित्व नहीं है। इसलिये उनके कारण होनेवाले वर्णाश्रमादिभेद, स्वर्गादिफल और उनके कारणभूत कर्म—ये सब-के-सब इस आत्माके लिये वैसे ही मिथ्या हैं; जैसे स्वप्नदर्शी पुरुषके द्वारा देखे हुए सब-के-सब पदार्थ॥ ३१॥

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