श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.13.33

एकादश स्कन्ध · अध्याय 13 · अथ त्रयोदशोऽध्यायः

एवं विमृश्य गुणतो मनसस्त्र्यवस्था ✎ 2152

मन्मायया मयि कृता इति निश्‍चितार्थाः।

संछिद्य हार्दमनुमानसदुक्तितीक्ष्ण-

ज्ञानासिना भजत माखिलसंशयाधिम्॥ ३३

evaṃ vimṛśya guṇato manasastryavasthā

manmāyayā mayi kṛtā iti niścitārthāḥ|

saṃchidya hārdamanumānasaduktitīkṣṇa-

jñānāsinā bhajata mākhilasaṃśayādhim|| 33

अर्थ

ऐसा विचारकर मनकी ये तीनों अवस्थाएँ गुणोंके द्वारा मेरी मायासे मेरे अंशस्वरूप जीवमें कल्पित की गयी हैं और आत्मामें ये नितान्त असत्य हैं, ऐसा निश्‍चय करके तुमलोग अनुमान, सत्पुरुषोंद्वारा किये गये उपनिषदोंके श्रवण और तीक्ष्ण ज्ञानखड्गके द्वारा सकल संशयोंके आधार अहंकारका छेदन करके हृदयमें स्थित मुझ परमात्माका भजन करो॥ ३३॥

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #2152 यूनिकोड-रूप (अक्षर वही): सस्त्रॺवस्था → सस्त्र्यवस्था

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