श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.13.5

एकादश स्कन्ध · अध्याय 13 · अथ त्रयोदशोऽध्यायः

तत्तत् सात्त्विकमेवैषां यद् यद् वृद्धाः प्रचक्षते।

निन्दन्ति तामसं तत्तद् राजसं तदुपेक्षितम्॥ ५

tattat sāttvikamevaiṣāṃ yad yad vṛddhāḥ pracakṣate|

nindanti tāmasaṃ tattad rājasaṃ tadupekṣitam|| 5

अर्थ

इनमेंसे शास्त्रज्ञ महात्मा जिनकी प्रशंसा करते हैं, वे सात्त्विक हैं, जिनकी निन्दा करते हैं, वे तामसिक हैं और जिनकी उपेक्षा करते हैं, वे वस्तुएँ राजसिक हैं॥ ५॥

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