श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.14.13

एकादश स्कन्ध · अध्याय 14 · अथ चतुर्दशोऽध्यायः

अकिंचनस्य दान्तस्य शान्तस्य समचेतसः।

मया सन्तुष्टमनसः सर्वाः सुखमया दिशः॥ १३

akiṃcanasya dāntasya śāntasya samacetasaḥ|

mayā santuṣṭamanasaḥ sarvāḥ sukhamayā diśaḥ|| 13

अर्थ

जो सब प्रकारके संग्रह-परिग्रहसे रहित—अकिंचन है, जो अपनी इन्द्रियोंपर विजय प्राप्त करके शान्त और समदर्शी हो गया है, जो मेरी प्राप्तिसे ही मेरे सान्‍निध्यका अनुभव करके ही सदा-सर्वदा पूर्ण सन्तोषका अनुभव करता है, उसके लिये आकाशका एक-एक कोना आनन्दसे भरा हुआ है॥ १३॥

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