श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.14.2

एकादश स्कन्ध · अध्याय 14 · अथ चतुर्दशोऽध्यायः

भवतोदाहृतः स्वामिन् भक्तियोगोऽनपेक्षितः।

निरस्य सर्वतः संगं येन त्वय्याविशेन्मनः॥ २

bhavatodāhṛtaḥ svāmin bhaktiyogo'napekṣitaḥ|

nirasya sarvataḥ saṃgaṃ yena tvayyāviśenmanaḥ|| 2

अर्थ

मेरे स्वामी! आपने तो अभी-अभी भक्तियोगको ही निरपेक्ष एवं स्वतन्त्र साधन बतलाया है; क्योंकि इसीसे सब ओरसे आसक्ति छोड़कर मन आपमें ही तन्मय हो जाता है॥ २॥

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