श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.14.25

एकादश स्कन्ध · अध्याय 14 · अथ चतुर्दशोऽध्यायः

यथाग्‍निना हेम मलं जहाति

ध्मातं पुनः स्वं भजते च रूपम्।

आत्मा च कर्मानुशयं विधूय

मद्भक्तियोगेन भजत्यथो माम्॥ २५

yathāgninā hema malaṃ jahāti

dhmātaṃ punaḥ svaṃ bhajate ca rūpam|

ātmā ca karmānuśayaṃ vidhūya

madbhaktiyogena bhajatyatho mām|| 25

अर्थ

जैसे आगमें तपानेपर सोना मैल छोड़ देता है—निखर जाता है और अपने असली शुद्ध रूपमें स्थित हो जाता है, वैसे ही मेरे भक्तियोगके द्वारा आत्मा कर्म-वासनाओंसे मुक्त होकर मुझको ही प्राप्त हो जाता है, क्योंकि मैं ही उसका वास्तविक स्वरूप हूँ॥ २५॥✎ 1744 1745

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #1744 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: खिल-खिलाकर → खिलखिलाकर
  • #1745 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: पिघल-कर → पिघलकर

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