श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.14.37

एकादश स्कन्ध · अध्याय 14 · अथ चतुर्दशोऽध्यायः

कर्णिकायां न्यसेत् सूर्यसोमा‌ग्‍नीनुत्तरोत्तरम्।

वह्निमध्ये स्मरेद् रूपं ममैतद् ध्यानमंगलम्॥ ३७

karṇikāyāṃ nyaset sūryasomāgnīnuttarottaram|

vahnimadhye smared rūpaṃ mamaitad dhyānamaṃgalam|| 37

अर्थ

कर्णिकापर क्रमशः सूर्य, चन्द्रमा और अग्‍निका न्यास करना चाहिये। तदनन्तर अग्‍निके अंदर मेरे इस रूपका स्मरण करना चाहिये। मेरा यह स्वरूप ध्यानके लिये बड़ा ही मंगलमय है॥ ३७॥

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