श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.14.44

एकादश स्कन्ध · अध्याय 14 · अथ चतुर्दशोऽध्यायः

तत्र लब्धपदं चित्तमाकृष्य व्योम्‍नि धारयेत्।

तच्च त्यक्त्वा मदारोहो न किंचिदपि चिन्तयेत्॥ ४४

tatra labdhapadaṃ cittamākṛṣya vyomni dhārayet|

tacca tyaktvā madāroho na kiṃcidapi cintayet|| 44

अर्थ

जब चित्त मुखारविन्दमें ठहर जाय, तब उसे वहाँसे हटाकर आकाशमें स्थिर करे। तदनन्तर आकाशका चिन्तन भी त्यागकर मेरे स्वरूपमें आरूढ हो जाय और मेरे सिवा किसी भी वस्तुका चिन्तन न करे॥ ४४॥

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