श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.16.23

एकादश स्कन्ध · अध्याय 16 · अथ षोडशोऽध्यायः

यज्ञानां ब्रह्मयज्ञोऽहं व्रतानामविहिंसनम्।

वाय्व‌ग्‍न्यर्काम्बुवागात्मा शुचीनामप्यहं शुचिः॥ २३

yajñānāṃ brahmayajño'haṃ vratānāmavihiṃsanam|

vāyvagnyarkāmbuvāgātmā śucīnāmapyahaṃ śuciḥ|| 23

अर्थ

पंचमहायज्ञोंमें ब्रह्मयज्ञ (स्वाध्याययज्ञ) हूँ, व्रतोंमें अहिंसाव्रत और शुद्ध करनेवाले पदार्थोंमें नित्यशुद्ध वायु, अग्‍नि, सूर्य, जल, वाणी एवं आत्मा हूँ॥ २३॥✎ 1750

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1750 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: महा-पुरुषोंमें) → महापुरुषोंमें)

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