श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.16.38

एकादश स्कन्ध · अध्याय 16 · अथ षोडशोऽध्यायः

अहमेतत्प्रसंख्यानं ज्ञानं तत्त्वविनिश्‍चयः।

मयेश्‍वरेण जीवेन गुणेन गुणिना विना।

सर्वात्मनापि सर्वेण न भावो विद्यते क्‍वचित्॥ ३८

ahametatprasaṃkhyānaṃ jñānaṃ tattvaviniścayaḥ|

mayeśvareṇa jīvena guṇena guṇinā vinā|

sarvātmanāpi sarveṇa na bhāvo vidyate kvacit|| 38

अर्थ

इन तत्त्वोंकी गणना, लक्षणोंद्वारा उनका ज्ञान तथा तत्त्वज्ञानरूप उसका फल भी मैं ही हूँ। मैं ही ईश्‍वर हूँ, मैं ही जीव हूँ, मैं ही गुण हूँ और मैं ही गुणी हूँ। मैं ही सबका आत्मा हूँ और मैं ही सब कुछ हूँ। मेरे अतिरिक्त और कोई भी पदार्थ कहीं भी नहीं है॥ ३८॥

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