श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.16.43

एकादश स्कन्ध · अध्याय 16 · अथ षोडशोऽध्यायः

यो वै वाङ्मनसी सम्यगसंयच्छन् धिया यतिः।

तस्य व्रतं तपो दानं स्त्रवत्यामघटाम्बुवत्॥ ४३

yo vai vāṅmanasī samyagasaṃyacchan dhiyā yatiḥ|

tasya vrataṃ tapo dānaṃ stravatyāmaghaṭāmbuvat|| 43

अर्थ

जो साधक बुद्धिके द्वारा वाणी और मनको पूर्णतया वशमें नहीं कर लेता, उसके व्रत, तप और दान उसी प्रकार क्षीण हो जाते हैं, जैसे कच्चे घड़ेमें भरा हुआ जल॥ ४३॥

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