श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.16.7

एकादश स्कन्ध · अध्याय 16 · अथ षोडशोऽध्यायः

ज्ञात्वा ज्ञातिवधं गर्ह्यमधर्मं राज्यहेतुकम्।

ततो निवृत्तो हन्ताहं हतोऽयमिति लौकिकः॥ ७

jñātvā jñātivadhaṃ garhyamadharmaṃ rājyahetukam|

tato nivṛtto hantāhaṃ hato'yamiti laukikaḥ|| 7

अर्थ

अर्जुनके मनमें ऐसी धारणा हुई कि कुटुम्बियोंको मारना, और सो भी राज्यके लिये, बहुत ही निन्दनीय अधर्म है। साधारण पुरुषोंके समान वह यह सोच रहा था कि ‘मैं मारनेवाला हूँ और ये सब मरनेवाले हैं। यह सोचकर वह युद्धसे उपरत हो गया॥ ७॥✎ 1748 1749

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #1748 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: ज्ञान-शक्तिप्रधान → ज्ञानशक्तिप्रधान
  • #1749 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: क्रिया-शक्ति-प्रधान → क्रिया-शक्तिप्रधान

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