श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.17.19

एकादश स्कन्ध · अध्याय 17 · अथ सप्तदशोऽध्यायः

शुश्रूषणं द्विजगवां देवानां चाप्यमायया।

तत्र लब्धेन सन्तोषः शूद्रप्रकृतयस्त्विमाः॥ १९

śuśrūṣaṇaṃ dvijagavāṃ devānāṃ cāpyamāyayā|

tatra labdhena santoṣaḥ śūdraprakṛtayastvimāḥ|| 19

अर्थ

ब्राह्मण, गौ और देवताओंकी निष्कपटभावसे सेवा करना और उसीसे जो कुछ मिल जाय, उसमें सन्तुष्ट रहना—ये शूद्र वर्णके स्वभाव हैं॥ १९॥

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