श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.17.26

एकादश स्कन्ध · अध्याय 17 · अथ सप्तदशोऽध्यायः

अ‌ग्‍न्यर्काचार्यगोविप्रगुरुवृद्धसुराञ्छुचिः७।

समाहित उपासीत सन्ध्ये च यतवाग् जपन्॥ २६

agnyarkācāryagovipraguruvṛddhasurāñchuciḥ|

samāhita upāsīta sandhye ca yatavāg japan|| 26

अर्थ

ब्रह्मचारीको पवित्रताके साथ एकाग्रचित्त होकर अग्‍नि, सूर्य, आचार्य, गौ, ब्राह्मण, गुरु, वृद्धजन और देवताओंकी उपासना करनी चाहिये तथा सायंकाल और प्रातःकाल मौन होकर सन्ध्योपासन एवं गायत्रीका जप करना चाहिये॥ २६॥

टिप्पणियाँ

  1. ७

    वृद्धान् सुरानपि।

     

    (मुद्रित पृष्ठ 816)

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