श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.17.29

एकादश स्कन्ध · अध्याय 17 · अथ सप्तदशोऽध्यायः

शुश्रूषमाण आचार्यं सदोपासीत नीचवत्।

यानशय्यासनस्थानैर्नातिदूरे कृतांजलिः॥ २९

śuśrūṣamāṇa ācāryaṃ sadopāsīta nīcavat|

yānaśayyāsanasthānairnātidūre kṛtāṃjaliḥ|| 29

अर्थ

आचार्य यदि जाते हों तो उनके पीछे-पीछे चले, उनके सो जानेके बाद बड़ी सावधानीसे उनसे थोड़ी दूरपर सोवे। थके हों, तो पास बैठकर चरण दबावे और बैठे हों, तो उनके आदेशकी प्रतीक्षामें हाथ जोड़कर पासमें ही खड़ा रहे। इस प्रकार अत्यन्त छोटे व्यक्तिकी भाँति सेवा-शुश्रूषाके द्वारा सदा-सर्वदा आचार्यकी आज्ञामें तत्पर रहे॥ २९॥

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