श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.17.31

एकादश स्कन्ध · अध्याय 17 · अथ सप्तदशोऽध्यायः

यद्यसौ छन्दसां लोकमारोक्ष्यन् ब्रह्मविष्टपम्।

गुरवे विन्यसेद्१ देहं स्वाध्यायार्थं बृहद्व्रतः॥ ३१

yadyasau chandasāṃ lokamārokṣyan brahmaviṣṭapam|

gurave vinyased dehaṃ svādhyāyārthaṃ bṛhadvrataḥ|| 31

अर्थ

यदि ब्रह्मचारीका विचार हो कि मैं मूर्तिमान् वेदोंके निवासस्थान ब्रह्मलोकमें जाऊँ, तो उसे आजीवन नैष्ठिक ब्रह्मचर्य-व्रत ग्रहण कर लेना चाहिये। और वेदोंके स्वाध्यायके लिये अपना सारा जीवन आचार्यकी सेवामें ही समर्पित कर देना चाहिये॥ ३१॥

टिप्पणियाँ

  1. १

    च न्यसेद्देहम्।

    (मुद्रित पृष्ठ 817)

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