श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.17.39

एकादश स्कन्ध · अध्याय 17 · अथ सप्तदशोऽध्यायः

गृहार्थी सदृशीं भार्यामुद्वहेदजुगुप्सिताम्।

यवीयसीं तु वयसा तां सवर्णामनुक्रमात्॥ ३९

gṛhārthī sadṛśīṃ bhāryāmudvahedajugupsitām|

yavīyasīṃ tu vayasā tāṃ savarṇāmanukramāt|| 39

अर्थ

प्रिय उद्धव! यदि ब्रह्मचर्याश्रमके बाद गृहस्थाश्रम स्वीकार करना हो तो ब्रह्मचारीको चाहिये कि अपने अनुरूप एवं शास्त्रोक्त लक्षणोंसे सम्पन्‍न कुलीन कन्यासे विवाह करे। वह अवस्थामें अपनेसे छोटी और अपने ही वर्णकी होनी चाहिये। यदि कामवश अन्य वर्णकी कन्यासे और विवाह करना हो तो क्रमशः अपनेसे निम्‍न वर्णकी कन्यासे विवाह कर सकता है॥ ३९॥✎ 1751 1752

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #1751 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: करने-वाली → करनेवाली
  • #1752 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: समान-रूपसे → समानरूपसे

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