श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.17.45

एकादश स्कन्ध · अध्याय 17 · अथ सप्तदशोऽध्यायः

सर्वाः समुद्धरेद् राजा पितेव व्यसनात् प्रजाः।

आत्मानमात्मना धीरो यथा गजपतिर्गजान्॥ ४५

sarvāḥ samuddhared rājā piteva vyasanāt prajāḥ|

ātmānamātmanā dhīro yathā gajapatirgajān|| 45

अर्थ

राजा पिताके समान सारी प्रजाका कष्टसे उद्धार करे—उन्हें बचावे, जैसे गजराज दूसरे गजोंकी रक्षा करता है और धीर होकर स्वयं अपने-आपसे अपना उद्धार करे॥ ४५॥

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