श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.17.49

एकादश स्कन्ध · अध्याय 17 · अथ सप्तदशोऽध्यायः

शूद्रवृत्तिं१ भजेद् वैश्यः शूद्रः कारुकटक्रियाम्२।

कृच्छ्रान्मुक्तो न गर्ह्येण वृत्तिं लिप्सेत कर्मणा॥ ४९

śūdravṛttiṃ bhajed vaiśyaḥ śūdraḥ kārukaṭakriyām|

kṛcchrānmukto na garhyeṇa vṛttiṃ lipseta karmaṇā|| 49

अर्थ

वैश्य भी आपत्तिके समय शूद्रोंकी वृत्ति सेवासे अपना जीवन-निर्वाह कर ले और शूद्र चटाई बुनने आदि कारुवृत्तिका आश्रय ले ले; परन्तु उद्धव! ये सारी बातें आपत्तिकालके लिये ही हैं। आपत्तिका समय बीत जानेपर निम्‍नवर्णोंकी वृत्तिसे जीविकोपार्जन करनेका लोभ न करे॥ ४९॥

टिप्पणियाँ

  1. १

    शूद्रवृत्तिर्भवेद्वैश्यः।

    (मुद्रित पृष्ठ 820)
  2. २

    कारुकटक्रियः।

     

    (मुद्रित पृष्ठ 820)

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