श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.17.51

एकादश स्कन्ध · अध्याय 17 · अथ सप्तदशोऽध्यायः

यदृच्छयोपपन्‍नेन शुक्लेनोपार्जितेन वा।

धनेनापीडयन् भृत्यान् न्यायेनैवाहरेत् क्रतून्॥ ५१

yadṛcchayopapannena śuklenopārjitena vā|

dhanenāpīḍayan bhṛtyān nyāyenaivāharet kratūn|| 51

अर्थ

गृहस्थ पुरुष अनायास प्राप्त अथवा शास्त्रोक्त रीतिसे उपार्जित अपने शुद्ध धनसे अपने भृत्य, आश्रित प्रजाजनको किसी प्रकारका कष्ट न पहुँचाते हुए न्याय और विधिके साथ ही यज्ञ करे॥ ५१॥

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