॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 11.17.53
पुत्रदाराप्तबन्धूनां संगमः पान्थसंगमः।
अनुदेहं वियन्त्येते स्वप्नो निद्रानुगो यथा॥ ५३
putradārāptabandhūnāṃ saṃgamaḥ pānthasaṃgamaḥ|
anudehaṃ viyantyete svapno nidrānugo yathā|| 53
अर्थ
यह जो स्त्री-पुत्र, भाई-बन्धु और गुरुजनोंका मिलना-जुलना है, यह वैसा ही है, जैसे किसी प्याऊपर कुछ बटोही इकट्ठे हो गये हों। सबको अलग-अलग रास्ते जाना है। जैसे स्वप्न नींद टूटनेतक ही रहता है, वैसे ही इन मिलने-जुलनेवालोंका सम्बन्ध ही बस, शरीरके रहनेतक ही रहता है; फिर तो कौन किसको पूछता है॥ ५३॥