श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.18.1

एकादश स्कन्ध · अध्याय 18 · अथाष्टादशोऽध्यायः

अथाष्टादशोऽध्यायः

वानप्रस्थ और संन्यासीके धर्म

श्रीभगवानुवाच

वनं विविक्षुः पुत्रेषु भार्यां न्यस्य सहैव वा।

वन एव वसेच्छान्तस्तृतीयं भागमायुषः॥ १

vanaṃ vivikṣuḥ putreṣu bhāryāṃ nyasya sahaiva vā|

vana eva vasecchāntastṛtīyaṃ bhāgamāyuṣaḥ|| 1

अर्थ

भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं—प्रिय उद्धव! यदि गृहस्थ मनुष्य वानप्रस्थ आश्रममें जाना चाहे, तो अपनी पत्‍नीको पुत्रोंके हाथ सौंप दे अथवा अपने साथ ही ले ले और फिर शान्त चित्तसे अपनी आयुका तीसरा भाग वनमें ही रहकर व्यतीत करे॥ १॥

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