श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.18.10

एकादश स्कन्ध · अध्याय 18 · अथाष्टादशोऽध्यायः

यस्त्वेतत् कृच्छ्रतश्‍चीर्णं तपो निःश्रेयसं महत्।

कामायाल्पीयसे युञ्ज्याद् बालिशः कोऽपरस्ततः॥ १०

yastvetat kṛcchrataścīrṇaṃ tapo niḥśreyasaṃ mahat|

kāmāyālpīyase yuñjyād bāliśaḥ ko'parastataḥ|| 10

अर्थ

प्रिय उद्धव! जो पुरुष बड़े कष्टसे किये हुए और मोक्ष देनेवाले इस महान् तपस्याको स्वर्ग, ब्रह्मलोक आदि छोटे-मोटे फलोंकी प्राप्तिके लिये करता है, उससे बढ़कर मूर्ख और कौन होगा? इसलिये तपस्याका अनुष्ठान निष्कामभावसे ही करना चाहिये॥ १०॥

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