श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.18.14

एकादश स्कन्ध · अध्याय 18 · अथाष्टादशोऽध्यायः

विप्रस्य वै संन्यसतो देवा दारादिरूपिणः।

विघ्नान् कुर्वन्त्ययं ह्यस्मानाक्रम्य समियात् परम्॥ १४

viprasya vai saṃnyasato devā dārādirūpiṇaḥ|

vighnān kurvantyayaṃ hyasmānākramya samiyāt param|| 14

अर्थ

उद्धवजी! जब ब्राह्मण संन्यास लेने लगता है, तब देवतालोग स्त्री-पुत्रादि सगे-सम्बन्धियोंका रूप धारण करके उसके संन्यास-ग्रहणमें विघ्न डालते हैं। वे सोचते हैं कि ‘अरे! यह तो हमलोगोंकी अवहेलना कर, हमलोगोंको लाँघकर परमात्माको प्राप्त होने जा रहा है’॥ १४॥

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