॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 11.18.28
ज्ञाननिष्ठो विरक्तो वा मद्भक्तो वानपेक्षकः।
सलिंगानाश्रमांस्त्यक्त्वा चरेदविधिगोचरः॥ २८
jñānaniṣṭho virakto vā madbhakto vānapekṣakaḥ|
saliṃgānāśramāṃstyaktvā caredavidhigocaraḥ|| 28
अर्थ
ज्ञाननिष्ठ, विरक्त, मुमुक्षु और मोक्षकी भी अपेक्षा न रखनेवाला मेरा भक्त आश्रमोंकी मर्यादामें बद्ध नहीं है। वह चाहे तो आश्रमों और उनके चिह्नोंको छोड़-छाड़कर, वेद-शास्त्रके विधि-निषेधोंसे परे होकर स्वच्छन्द विचरे॥ २८॥