श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.18.32

एकादश स्कन्ध · अध्याय 18 · अथाष्टादशोऽध्यायः

एक एव परो ह्यात्मा भूतेष्वात्मन्यवस्थितः।

यथेन्दुरुदपात्रेषु भूतान्येकात्मकानि च॥ ३२

eka eva paro hyātmā bhūteṣvātmanyavasthitaḥ|

yathendurudapātreṣu bhūtānyekātmakāni ca|| 32

अर्थ

जैसे एक ही चन्द्रमा जलसे भरे हुए विभिन्‍न पात्रोंमें अलग-अलग दिखायी देता है, वैसे ही एक ही परमात्मा समस्त प्राणियोंमें और अपनेमें भी स्थित है। सबकी आत्मा तो एक है ही, पंचभूतोंसे बने हुए शरीर भी सबके एक ही हैं, क्योंकि सब पांचभौतिक ही तो हैं। (ऐसी अवस्थामें किसीसे भी वैर-विरोध करना अपना ही वैर-विरोध है)॥ ३२॥

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