श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.18.38

एकादश स्कन्ध · अध्याय 18 · अथाष्टादशोऽध्यायः

दुःखोदर्केषु कामेषु जातनिर्वेद आत्मवान्।

अजिज्ञासितमद्धर्मो गुरुं मुनिमुपाव्रजेत्॥ ३८

duḥkhodarkeṣu kāmeṣu jātanirveda ātmavān|

ajijñāsitamaddharmo guruṃ munimupāvrajet|| 38

अर्थ

उद्धवजी! (यह तो हुई ज्ञानवान्की बात, अब केवल वैराग्यवान्की बात सुनो।) जितेन्द्रिय पुरुष, जब यह निश्‍चय हो जाय कि संसारके विषयोंके भोगका फल दुःख-ही-दुःख है, तब वह विरक्त हो जाय और यदि वह मेरी प्राप्तिके साधनोंको न जानता हो तो भगवच्चिन्तनमें तन्मय रहनेवाले ब्रह्मनिष्ठ सद्गुरुकी शरण ग्रहण करे॥ ३८॥

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