श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.18.40

एकादश स्कन्ध · अध्याय 18 · अथाष्टादशोऽध्यायः

यस्त्वसंयतषड्वर्गः प्रचण्डेन्द्रियसारथिः।

ज्ञानवैराग्यरहितस्त्रिदण्डमुपजीवति ॥ ४०

yastvasaṃyataṣaḍvargaḥ pracaṇḍendriyasārathiḥ|

jñānavairāgyarahitastridaṇḍamupajīvati || 40

अर्थ

किन्तु जिसने पाँच इन्द्रियाँ और मन, इन छहोंपर विजय नहीं प्राप्त की है, जिसके इन्द्रियरूपी घोड़े और बुद्धिरूपी सारथि बिगड़े हुए हैं और जिसके हृदयमें न ज्ञान है और न तो वैराग्य, वह यदि त्रिदण्डी संन्यासीका वेष धारणकर पेट पालता है तो वह संन्यासधर्मका सत्तानाश ही कर रहा है और अपने पूज्य देवताओंको, अपने-आपको और अपने हृदयमें स्थित मुझको ठगनेकी चेष्टा करता है। अभी उस वेषमात्रके संन्यासीकी वासनाएँ क्षीण नहीं हुई हैं; इसलिये वह इस लोक और परलोक दोनोंसे हाथ धो बैठता है॥ ४०-४१॥

यह अर्थ श्लोक 40–41 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

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