॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 11.19.10
दष्टं जनं संपतितं बिलेऽस्मिन्
कालाहिना क्षुद्रसुखोरुतर्षम्।
समुद्धरैनं कृपयाऽऽपवर्ग्यै-
र्वचोभिरासिञ्च महानुभाव॥ १०
daṣṭaṃ janaṃ saṃpatitaṃ bile'smin
kālāhinā kṣudrasukhorutarṣam|
samuddharainaṃ kṛpayā''pavargyai-
rvacobhirāsiñca mahānubhāva|| 10
अर्थ
महानुभाव! आपका यह अपना सेवक अँधेरे कुएँमें पड़ा हुआ है, कालरूपी सर्पने इसे डस रखा है; फिर भी विषयोंके क्षुद्र सुख-भोगोंकी तीव्र तृष्णा मिटती नहीं, बढ़ती ही जा रही है। आप कृपा करके इसका उद्धार कीजिये और इससे मुक्त करनेवाली वाणीकी सुधा-धारासे इसे सराबोर कर दीजिये॥ १०॥