श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.19.10

एकादश स्कन्ध · अध्याय 19 · अथैकोनविंशोऽध्यायः

दष्टं जनं संपतितं बिलेऽस्मिन्

कालाहिना क्षुद्रसुखोरुतर्षम्।

समुद्धरैनं कृपयाऽऽपवर्ग्यै-

र्वचोभिरासिञ्च महानुभाव॥ १०

daṣṭaṃ janaṃ saṃpatitaṃ bile'smin

kālāhinā kṣudrasukhorutarṣam|

samuddharainaṃ kṛpayā''pavargyai-

rvacobhirāsiñca mahānubhāva|| 10

अर्थ

महानुभाव! आपका यह अपना सेवक अँधेरे कुएँमें पड़ा हुआ है, कालरूपी सर्पने इसे डस रखा है; फिर भी विषयोंके क्षुद्र सुख-भोगोंकी तीव्र तृष्णा मिटती नहीं, बढ़ती ही जा रही है। आप कृपा करके इसका उद्धार कीजिये और इससे मुक्त करनेवाली वाणीकी सुधा-धारासे इसे सराबोर कर दीजिये॥ १०॥

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें