॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 11.19.2
ज्ञानिनस्त्वहमेवेष्टः स्वार्थो हेतुश्च संमतः।
स्वर्गश्चैवापवर्गश्च नान्योऽर्थो मदृते प्रियः॥ २
jñāninastvahameveṣṭaḥ svārtho hetuśca saṃmataḥ|
svargaścaivāpavargaśca nānyo'rtho madṛte priyaḥ|| 2
अर्थ
ज्ञानी पुरुषका अभीष्ट पदार्थ मैं ही हूँ, उसके साधन-साध्य, स्वर्ग और अपवर्ग भी मैं ही हूँ, मेरे अतिरिक्त और किसी भी पदार्थसे वह प्रेम नहीं करता॥ २॥