श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.19.38

एकादश स्कन्ध · अध्याय 19 · अथैकोनविंशोऽध्यायः

ऋतं च सूनृता वाणी कविभिः परिकीर्तिता।

कर्मस्वसंगमः शौचं त्यागः संन्यास उच्यते॥ ३८

ṛtaṃ ca sūnṛtā vāṇī kavibhiḥ parikīrtitā|

karmasvasaṃgamaḥ śaucaṃ tyāgaḥ saṃnyāsa ucyate|| 38

अर्थ

इसी प्रकार सत्य और मधुर भाषणको ही महात्माओंने ‘ऋत’ कहा है। कर्मोंमें आसक्त न होना ही ‘शौच’ है। कामनाओंका त्याग ही सच्चा ‘संन्यास’ है॥ ३८॥

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