श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.19.42

एकादश स्कन्ध · अध्याय 19 · अथैकोनविंशोऽध्यायः

मूर्खो देहाद्यहंबुद्धिः पन्था मन्‍निगमः स्मृतः।

उत्पथश्‍चित्तविक्षेपः स्वर्गः सत्त्वगुणोदयः॥ ४२

mūrkho dehādyahaṃbuddhiḥ panthā mannigamaḥ smṛtaḥ|

utpathaścittavikṣepaḥ svargaḥ sattvaguṇodayaḥ|| 42

अर्थ

शरीर आदिमें जिसका मैंपन है, वही ‘मूर्ख’ है। जो संसारकी ओरसे निवृत्त करके मुझे प्राप्त करा देता है, वही सच्चा ‘सुमार्ग’ है। चित्तकी बहिर्मुखता ही ‘कुमार्ग’ है। सत्त्वगुणकी वृद्धि ही ‘स्वर्ग’ और सखे! तमोगुणकी वृद्धि ही ‘नरक’ है। गुरु ही सच्चा ‘भाई-बन्धु’ है और वह गुरु मैं हूँ। यह मनुष्य-शरीर ही सच्चा ‘घर’ है तथा सच्चा ‘धनी’ वह है, जो गुणोंसे सम्पन्‍न है, जिसके पास गुणोंका खजाना है॥ ४२-४३॥

यह अर्थ श्लोक 42–43 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

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