श्रीशुकदेवजी कहते हैं—राजन्! बुद्धिमान् वसुदेवजीने भगवान्के स्वरूप और गुण आदिके श्रवणके अभिप्रायसे ही यह प्रश्न किया था। देवर्षि नारद उनका प्रश्न सुनकर भगवान्के अचिन्त्य अनन्त कल्याणमय गुणोंके स्मरणमें तन्मय हो गये और प्रेम एवं आनन्दमें भरकर वसुदेवजीसे बोले॥ १०॥
राजन्नेवं कृतप्रश्नो वसुदेवेन धीमता।
प्रीतस्तमाह देवर्षिर्हरेः संस्मारितो गुणैः॥ १०
श्रीशुकदेवजी कहते हैं—राजन्! बुद्धिमान् वसुदेवजीने भगवान्के स्वरूप और गुण आदिके श्रवणके अभिप्रायसे ही यह प्रश्न किया था। देवर्षि नारद उनका प्रश्न सुनकर भगवान्के अचिन्त्य अनन्त कल्याणमय गुणोंके स्मरणमें तन्मय हो गये और प्रेम एवं आनन्दमें भरकर वसुदेवजीसे बोले॥ १०॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 11.2.10 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 714) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/2/10/