श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.2.10

एकादश स्कन्ध · अध्याय 2 · अथ द्वितीयोऽध्यायः

श्रीशुक उवाच

राजन्‍नेवं कृतप्रश्‍नो वसुदेवेन धीमता।

प्रीतस्तमाह देवर्षिर्हरेः संस्मारितो गुणैः॥ १०

rājannevaṃ kṛtapraśno vasudevena dhīmatā|

prītastamāha devarṣirhareḥ saṃsmārito guṇaiḥ|| 10

अर्थ

श्रीशुकदेवजी कहते हैं—राजन्! बुद्धिमान् वसुदेवजीने भगवान्‌के स्वरूप और गुण आदिके श्रवणके अभिप्रायसे ही यह प्रश्‍न किया था। देवर्षि नारद उनका प्रश्‍न सुनकर भगवान्‌के अचिन्त्य अनन्त कल्याणमय गुणोंके स्मरणमें तन्मय हो गये और प्रेम एवं आनन्दमें भरकर वसुदेवजीसे बोले॥ १०॥

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