श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.2.17

एकादश स्कन्ध · अध्याय 2 · अथ द्वितीयोऽध्यायः

तेषां वै भरतो ज्येष्ठो नारायणपरायणः।

विख्यातं वर्षमेतद् यन्‍नाम्‍ना भारतमद्भुतम्॥ १७

teṣāṃ vai bharato jyeṣṭho nārāyaṇaparāyaṇaḥ|

vikhyātaṃ varṣametad yannāmnā bhāratamadbhutam|| 17

अर्थ

उनमें सबसे बड़े थे राजर्षि भरत। वे भगवान् नारायणके परम प्रेमी भक्त थे। उन्हींके नामसे यह भूमिखण्ड, जो पहले ‘अजनाभवर्ष’ कहलाता था, ‘भारतवर्ष’ कहलाया। यह भारतवर्ष भी एक अलौकिक स्थान है ॥ १७॥✎ 1724 1725

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #1724 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: कर-भाजन॥ → करभाजन॥
  • #1725 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: राज्य-भोग → राज्यभोग

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