श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.2.32

एकादश स्कन्ध · अध्याय 2 · अथ द्वितीयोऽध्यायः

श्रीनारद उवाच

एवं ते निमिना पृष्टा वसुदेव महत्तमाः।

प्रतिपूज्याब्रुवन् प्रीत्या ससदस्यर्त्विजं नृपम्॥ ३२

evaṃ te niminā pṛṣṭā vasudeva mahattamāḥ|

pratipūjyābruvan prītyā sasadasyartvijaṃ nṛpam|| 32

अर्थ

देवर्षि नारदजीने कहा—वसुदेवजी! जब राजा निमिने उन भगवत्प्रेमी संतोंसे यह प्रश्‍न किया, तब उन लोगोंने बड़े प्रेमसे उनका और उनके प्रश्‍नका सम्मान किया और सदस्य तथा ऋत्विजोंके साथ बैठे हुए राजा निमिसे बोले॥ ३२॥

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