श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.2.37

एकादश स्कन्ध · अध्याय 2 · अथ द्वितीयोऽध्यायः

भयं द्वितीयाभिनिवेशतः स्या-

दीशादपेतस्य विपर्ययोऽस्मृतिः।

तन्माययातो बुध आभजेत्तं

भक्त्यैकयेशं गुरुदेवतात्मा॥ ३७

bhayaṃ dvitīyābhiniveśataḥ syā-

dīśādapetasya viparyayo'smṛtiḥ|

tanmāyayāto budha ābhajettaṃ

bhaktyaikayeśaṃ gurudevatātmā|| 37

अर्थ

ईश्‍वरसे विमुख पुरुषको उनकी मायासे अपने स्वरूपकी विस्मृति हो जाती है और इस विस्मृतिसे ही ‘मैं देवता हूँ, मैं मनुष्य हूँ,’ इस प्रकारका भ्रम—विपर्यय हो जाता है। इस देह आदि अन्य वस्तुमें अभिनिवेश, तन्मयता होनेके कारण ही बुढ़ापा, मृत्यु, रोग आदि अनेकों भय होते हैं। इसलिये अपने गुरुको ही आराध्यदेव परम प्रियतम मानकर अनन्य भक्तिके द्वारा उस ईश्‍वरका भजन करना चाहिये॥ ३७॥

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