॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 11.2.41
खं वायुमग्निं सलिलं महीं च
ज्योतींषि सत्त्वानि दिशो द्रुमादीन्।
सरित्समुद्रांश्च हरेः शरीरं
यत् किञ्च भूतं प्रणमेदनन्यः॥ ४१
khaṃ vāyumagniṃ salilaṃ mahīṃ ca
jyotīṃṣi sattvāni diśo drumādīn|
saritsamudrāṃśca hareḥ śarīraṃ
yat kiñca bhūtaṃ praṇamedananyaḥ|| 41
अर्थ
राजन्! यह आकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी, ग्रह-नक्षत्र, प्राणी, दिशाएँ, वृक्ष-वनस्पति, नदी, समुद्र—सब-के-सब भगवान्के शरीर हैं। सभी रूपोंमें स्वयं भगवान् प्रकट हैं। ऐसा समझकर वह जो कोई भी उसके सामने आ जाता है—चाहे वह प्राणी हो या अप्राणी—उसे अनन्यभावसे—भगवद्भावसे प्रणाम करता है॥ ४१॥