na tadbhakteṣu cānyeṣu sa bhaktaḥ prākṛtaḥ smṛtaḥ|| 47
अर्थ
और जो भगवान्के अर्चा-विग्रह—मूर्ति आदिकी पूजा तो श्रद्धासे करता है, परन्तु भगवान्के भक्तों या दूसरे लोगोंकी विशेष सेवा-शुश्रूषा नहीं करता, वह साधारण श्रेणीका भगवद्भक्त है॥ ४७॥
अर्चायामेव हरये पूजां यः श्रद्धयेहते।
न तद्भक्तेषु चान्येषु स भक्तः प्राकृतः स्मृतः॥ ४७
और जो भगवान्के अर्चा-विग्रह—मूर्ति आदिकी पूजा तो श्रद्धासे करता है, परन्तु भगवान्के भक्तों या दूसरे लोगोंकी विशेष सेवा-शुश्रूषा नहीं करता, वह साधारण श्रेणीका भगवद्भक्त है॥ ४७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 11.2.47 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 720) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/2/47/