श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.2.47

एकादश स्कन्ध · अध्याय 2 · अथ द्वितीयोऽध्यायः

अर्चायामेव हरये पूजां यः श्रद्धयेहते।

न तद्भक्तेषु चान्येषु स भक्तः प्राकृतः स्मृतः॥ ४७

arcāyāmeva haraye pūjāṃ yaḥ śraddhayehate|

na tadbhakteṣu cānyeṣu sa bhaktaḥ prākṛtaḥ smṛtaḥ|| 47

अर्थ

और जो भगवान्‌के अर्चा-विग्रह—मूर्ति आदिकी पूजा तो श्रद्धासे करता है, परन्तु भगवान्‌के भक्तों या दूसरे लोगोंकी विशेष सेवा-शुश्रूषा नहीं करता, वह साधारण श्रेणीका भगवद्भक्त है॥ ४७॥

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