॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 11.2.52
न यस्य स्वः पर इति वित्तेष्वात्मनि वा भिदा।
सर्वभूतसमः शान्तः स वै भागवतोत्तमः॥ ५२
na yasya svaḥ para iti vitteṣvātmani vā bhidā|
sarvabhūtasamaḥ śāntaḥ sa vai bhāgavatottamaḥ|| 52
अर्थ
जो धन-सम्पत्ति अथवा शरीर आदिमें ‘यह अपना है और यह पराया’—इस प्रकारका भेद-भाव नहीं रखता, समस्त पदार्थोंमें समस्वरूप परमात्माको देखता रहता है, समभाव रखता है तथा किसी भी घटना अथवा संकल्पसे विक्षिप्त न होकर शान्त रहता है, वह भगवान्का उत्तम भक्त है॥ ५२॥