श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.2.54

एकादश स्कन्ध · अध्याय 2 · अथ द्वितीयोऽध्यायः

भगवत उरुविक्रमाङ्‌घ्रिशाखा-

नखमणिचन्द्रिकया निरस्ततापे।

हृदि कथमुपसीदतां पुनः स

प्रभवति चन्द्र इवोदितेऽर्कतापः॥ ५४

bhagavata uruvikramāṅghriśākhā-

nakhamaṇicandrikayā nirastatāpe|

hṛdi kathamupasīdatāṃ punaḥ sa

prabhavati candra ivodite'rkatāpaḥ|| 54

अर्थ

रासलीलाके अवसरपर नृत्य-गतिसे भाँति-भाँतिके पाद-विन्यास करनेवाले निखिल सौन्दर्य-माधुर्य-निधि भगवान्‌के चरणोंके अंगुलि-नखकी मणि-चन्द्रिकासे जिन शरणागत भक्तजनोंके हृदयका विरहजन्य संताप एक बार दूर हो चुका है, उनके हृदयमें वह फिर कैसे आ सकता है, जैसे चन्द्रोदय होनेपर सूर्यका ताप नहीं लग सकता॥ ५४॥

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें