श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.2.8

एकादश स्कन्ध · अध्याय 2 · अथ द्वितीयोऽध्यायः

अहं किल पुरानन्तं प्रजार्थो भुवि मुक्तिदम्।

अपूजयं न मोक्षाय मोहितो देवमायया॥ ८

ahaṃ kila purānantaṃ prajārtho bhuvi muktidam|

apūjayaṃ na mokṣāya mohito devamāyayā|| 8

अर्थ

पहले जन्ममें मैंने मुक्ति देनेवाले भगवान्‌की आराधना तो की थी, परन्तु इसलिये नहीं कि मुझे मुक्ति मिले। मेरी आराधनाका उद्देश्य था कि वे मुझे पुत्ररूपमें प्राप्त हों। उस समय मैं भगवान्‌की लीलासे मुग्ध हो रहा था॥ ८॥

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