श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.20.13

एकादश स्कन्ध · अध्याय 20 · अथ विंशोऽध्यायः

न नरः स्वर्गतिं कांक्षेन्‍नारकीं वा विचक्षणः।

नेमं लोकं च कांक्षेत देहावेशात् प्रमाद्यति॥ १३

na naraḥ svargatiṃ kāṃkṣennārakīṃ vā vicakṣaṇaḥ|

nemaṃ lokaṃ ca kāṃkṣeta dehāveśāt pramādyati|| 13

अर्थ

यह विधि-निषेधरूप कर्मका अधिकारी मनुष्य-शरीर बहुत ही दुर्लभ है। स्वर्ग और नरक दोनों ही लोकोंमें रहनेवाले जीव इसकी अभिलाषा करते रहते हैं; क्योंकि इसी शरीरमें अन्तःकरणकी शुद्धि होनेपर ज्ञान अथवा भक्तिकी प्राप्ति हो सकती है, स्वर्ग अथवा नरकका भोगप्रधान शरीर किसी भी साधनके उपयुक्त नहीं है। बुद्धिमान् पुरुषको न तो स्वर्गकी अभिलाषा करनी चाहिये और न नरककी ही। और तो क्या, इस मनुष्य-शरीरकी भी कामना न करनी चाहिये; क्योंकि किसी भी शरीरमें गुणबुद्धि और अभिमान हो जानेसे अपने वास्तविक स्वरूपकी प्राप्तिके साधनमें प्रमाद होने लगता है॥ १२-१३॥

यह अर्थ श्लोक 12–13 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

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