जैसे सवार घोड़ेको अपने वशमें करते समय उसे अपने मनो-भावकी पहचान कराना चाहता है—अपनी इच्छाके अनुसार उसे चलाना चाहता है और बार-बार फुसलाकर उसे अपने वशमें कर लेता है, वैसे ही मनको फुसलाकर, उसे मीठी-मीठी बातें सुनाकर वशमें कर लेना भी परम योग है॥ २१॥✎ 1754
एष वै परमो योगो मनसः संग्रहः स्मृतः।
हृदयज्ञत्वमन्विच्छन् दम्यस्येवार्वतो मुहुः॥ २१
जैसे सवार घोड़ेको अपने वशमें करते समय उसे अपने मनो-भावकी पहचान कराना चाहता है—अपनी इच्छाके अनुसार उसे चलाना चाहता है और बार-बार फुसलाकर उसे अपने वशमें कर लेता है, वैसे ही मनको फुसलाकर, उसे मीठी-मीठी बातें सुनाकर वशमें कर लेना भी परम योग है॥ २१॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 11.20.21 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 836) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/20/21/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)