श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.20.28

एकादश स्कन्ध · अध्याय 20 · अथ विंशोऽध्यायः

ततो भजेत मां प्रीतः श्रद्धालुर्दृढनिश्‍चयः।

जुषमाणश्‍च तान् कामान् दुःखोदर्कांश्‍च गर्हयन्॥ २८

tato bhajeta māṃ prītaḥ śraddhālurdṛḍhaniścayaḥ|

juṣamāṇaśca tān kāmān duḥkhodarkāṃśca garhayan|| 28

अर्थ

जो साधक समस्त कर्मोंसे विरक्त हो गया हो, उनमें दुःखबुद्धि रखता हो, मेरी लीलाकथाके प्रति श्रद्धालु हो और यह भी जानता हो कि सभी भोग और भोगवासनाएँ दुःखरूप हैं, किन्तु इतना सब जानकर भी जो उनके परित्यागमें समर्थ न हो, उसे चाहिये कि उन भोगोंको तो भोग ले; परन्तु उन्हें सच्चे हृदयसे दुःखजनक समझे और मन-ही-मन उनकी निन्दा करे तथा उसे अपना दुर्भाग्य ही समझे। साथ ही इस दुविधाकी स्थितिसे छुटकारा पानेके लिये श्रद्धा, दृढ़ निश्‍चय और प्रेमसे मेरा भजन करे॥ २७-२८॥✎ 1755

यह अर्थ श्लोक 27–28 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1755 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: कल्याण-स्वरूप → कल्याणस्वरूप

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