श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.20.34

एकादश स्कन्ध · अध्याय 20 · अथ विंशोऽध्यायः

न किंचित् साधवो धीरा भक्ता ह्येकान्तिनो मम।

वाञ्छन्त्यपि मया दत्तं कैवल्यमपुनर्भवम्॥ ३४

na kiṃcit sādhavo dhīrā bhaktā hyekāntino mama|

vāñchantyapi mayā dattaṃ kaivalyamapunarbhavam|| 34

अर्थ

मेरे अनन्यप्रेमी एवं धैर्यवान् साधु भक्त स्वयं तो कुछ चाहते ही नहीं; यदि मैं उन्हें देना चाहता हूँ और देता भी हूँ तो भी दूसरी वस्तुओंकी तो बात ही क्या—वे कैवल्य-मोक्ष भी नहीं लेना चाहते॥ ३४॥✎ 1755

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1755 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: कल्याण-स्वरूप → कल्याणस्वरूप

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