श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.20.7

एकादश स्कन्ध · अध्याय 20 · अथ विंशोऽध्यायः

निर्विण्णानां ज्ञानयोगो न्यासिनामिह कर्मसु।

तेष्वनिर्विण्णचित्तानां कर्मयोगस्तु कामिनाम्॥ ७

nirviṇṇānāṃ jñānayogo nyāsināmiha karmasu|

teṣvanirviṇṇacittānāṃ karmayogastu kāminām|| 7

अर्थ

उद्धवजी! जो लोग कर्मों तथा उनके फलोंसे विरक्त हो गये हैं और उनका त्याग कर चुके हैं, वे ज्ञानयोगके अधिकारी हैं। इसके विपरीत जिनके चित्तमें कर्मों और उनके फलोंसे वैराग्य नहीं हुआ है, उनमें दुःखबुद्धि नहीं हुई है, वे सकाम व्यक्ति कर्मयोगके अधिकारी हैं॥ ७॥

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