श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.22.12

एकादश स्कन्ध · अध्याय 22 · अथ द्वाविंशोऽध्यायः

प्रकृतिर्गुणसाम्यं वै प्रकृतेर्नात्मनो गुणाः।

सत्त्वं रजस्तम इति स्थित्युत्पत्त्यन्तहेतवः॥ १२

prakṛtirguṇasāmyaṃ vai prakṛternātmano guṇāḥ|

sattvaṃ rajastama iti sthityutpattyantahetavaḥ|| 12

अर्थ

तीनों गुणोंकी साम्यावस्था ही प्रकृति है; इसलिये सत्त्व, रज आदि गुण आत्माके नहीं, प्रकृतिके ही हैं। इन्हींके द्वारा जगत‍्की स्थिति, उत्पत्ति और प्रलय हुआ करते हैं। इसलिये ज्ञान आत्माका गुण नहीं, प्रकृतिका ही गुण सिद्ध होता है॥ १२॥✎ 1763

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1763 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: मानने-वाले → माननेवाले

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