श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.22.2

एकादश स्कन्ध · अध्याय 22 · अथ द्वाविंशोऽध्यायः

केचित् षड्विंशतिं प्राहुरपरे पंचविंशतिम्।

सप्तैके नव षट् केचिच्चत्वार्येकादशापरे॥ २

kecit ṣaḍviṃśatiṃ prāhurapare paṃcaviṃśatim|

saptaike nava ṣaṭ keciccatvāryekādaśāpare|| 2

अर्थ

किन्तु कुछ लोग छब्बीस तत्त्व बतलाते हैं तो कुछ पचीस; कोई सात, नौ अथवा छः स्वीकार करते हैं, कोई चार बतलाते हैं तो कोई ग्यारह॥ २॥

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