श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.22.26

एकादश स्कन्ध · अध्याय 22 · अथ द्वाविंशोऽध्यायः

उद्धव उवाच

प्रकृतिः पुरुषश्‍चोभौ यद्यप्यात्मविलक्षणौ।

अन्योन्यापाश्रयात् कृष्ण दृश्यते न भिदा तयोः॥ २६

prakṛtiḥ puruṣaścobhau yadyapyātmavilakṣaṇau|

anyonyāpāśrayāt kṛṣṇa dṛśyate na bhidā tayoḥ|| 26

अर्थ

उद्धवजीने कहा—श्यामसुन्दर! यद्यपि स्वरूपतः प्रकृति और पुरुष—दोनों एक-दूसरेसे सर्वथा भिन्‍न हैं, तथापि वे आपसमें इतने घुल-मिल गये हैं कि साधारणतः उनका भेद नहीं जान पड़ता। प्रकृतिमें पुरुष और पुरुषमें प्रकृति अभिन्‍न-से प्रतीत होते हैं। इनकी भिन्‍नता स्पष्ट कैसे हो?॥ २६॥

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